01 June 2010

"ये मैं हूं पापा"

पिछले दो घंटे से चल रही इस मीटिंग में 115 मिनट तो पीने पिलाने में ही निकल गये, बस आखिरी 5 मिनट डील के थे। सौ-सौ के नोटों की गड्डी जेब में डालते हुए उसने फलाना & कम्पनी के मैनेजर को फाईल पास होने और उसका काम हो जाने का आश्वासन दिया।  सोफे से उठते हुए उसने नमस्ते की और बार से बाहर आ गया। कार चलाते हुए भी उसकी लाल हो गई आंखें रोड के साथ-साथ पटरी पर कुछ तलाशती जा रही थी। 
एक बस स्टाप पर दुपट्टा मुंह पर लपेटे हुए, बस का इंतजार करती लडकी के पास जाकर कार रोकी और एक आंख को झटक कर बोला - "ए चलती क्या"
"ये मैं हूं पापा" - आवाज आई।

9 comments:

  1. ab is par kya kahun...sharm se sar jhuk gaya...ek film yaad aa gayi...naam yaad nahi par usme bhi kuch aisa hi tha...rajat kapoor actor tha...

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  2. दिल को दहलाने वाली और इंसानियत को शर्मसार करने वाली लघु कथा है. आपने जो सन्देश देने का प्रयास किया है उसको मैं सलाम करता हूँ.

    बहुत खूब!

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  3. भाई साहब, क्षमा करे, कहानी तो आपने अच्छी फ्रेम की थी मगर उसमे कुछ तकनीकी खामिया भी नजर आ रही है, मसलन मीटिंग जब सिर्फ पिछले दो घंटे (१२० मिनट) से चल रही थी तो १२५ मिनट पिलाने में कैसे लग गए? और ४५-५० साल का खूसट इतनी बड़ी हिम्मत बस स्टॉप पे कर ले , मुझे तो सोच के कंपकंपी लगती है !

    हाँ इस गलत पह्मी का एक मजेदार वाकया अपने ही मोहल्ले में घटित एक सज्जन के साथ का बताता हूँ ! सज्जन सरकारी अफसर है, साल-दोएक पहले एक कार ली थी उसी से ऑफिस आते जाते है ! और इसलिए थोड़ा अपनी अकड़ में भी रहते है, ! बेटा, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढता है शाम को बैक से घर लौट रहा था तो अपने पापा की गाडी देख बैक से मस्करी करने लगा, बाप को तंग करने के लिए ! चूँकि उसने काले शीशे का हैलमेट पहना था इसलिए बाप यह नहीं समझ पाया कि वह उसी का बेटा है! पता नहीं बाइक का नंबर भी ठीक से याद था अथवा नहीं ! काफी दूर जाकर एक जगह बाप को बाइक से आगे निकलने का मौक़ा मिल गया , उसने गाडी बाइक के आगे लगाईं और नीचे उतारकर उस पर जल्लाते हुए बोला बोला ! साले अपने बाप की सड़क समझ रखी है क्या ? बेटे ने भी हैलमेट उतारा और मुस्कुराते हुए बोला जी पापा !

    यह बात उन्होंने एक दिन शाम को अशोसियेशन की मीटिंग में बताई, तो हम लोग जोर से हंस पड़े !

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  4. sorry, बाईक की जगह बैक लिख गया !

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  5. uff............dil dahlane wali laghukatha hai .........magar ek sikh bhi deti hai agar is tarah ki mansikta wale log samjhein to.

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  6. @ आदरणीय गोदियाल जी नमस्कार
    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया जी मेरी गलती बताने के लिये। और क्षमा तो मुझे आप सबसे मांगनी चाहिये। अब मैनें इसे ठीक कर दिया है।

    और 45-50 वर्ष की उम्र के लोग भी दिल्ली में छेडखानी और वेश्यागमन करते हुये पकडे जाते रहे हैं।

    प्रणाम

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  7. गोदियाल साहब आप 45-50 साल के व्यक्ति को खूसट ओर बुढा समझते है?? मै तो ५४ का होने वाला हुं, लेकिन आज भी जवान समझता हुं अपने आप को, हां बच्चे अकंल, चाचा, ताऊ , नाना, ओर दादा जरुर बुलाते है, लेकिन यह अर्थ नही कि मै भी अपने आप को बुढा समझू, आज भी १० किलो मिटर पेदल चल सकता हुं, मै बतमीज नही लेकिन अंतर साहिल की बात सही है कि 45-50 वर्ष की उम्र के लोग भी दिल्ली में छेडखानी और वेश्यागमन करते हुये पकडे जाते रहे हैं।

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  8. हिल गई अंतरात्मा .. पर सच्चाई यही है .. बचपन में सुनी कुछ पंक्तिया सटीक लगी आपकी रचना के लिए
    "सतसैया के दोहरे जो नावक के तीर ,देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर "

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