18 February 2010

मकई के दाने के गर्म होने पर आवाज कर के फटना

बातचीत रहेगी जारी, के अपने ब्लाग पर प्रकाशित करने की अनुमति मांगनें पर, श्री आनन्द शर्मा जी के अमूल्य विचार और देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत एक पत्र
अन्तर सोहिल जी, नमस्कार

देशभक्तिपूर्ण कविता आपको पसंद आयी - अहोभाग्य - धन्यवाद
कविता का रचयिता इस अकिंचन का अनुज धर्मेश शर्मा है - मैंने तो केवल मात्रा / वर्तनी का संशोधन एवं संपादन किया है।
मातृभूमि भारत के प्रति देशभक्ति की भावना या रचना पर एकाधिकार अथवा नियंत्रण अवांछित है। प्रत्येक देशभक्त भारतीय अपनी अपनी भाषा में अनुवाद कर के प्रसारित करे। किसी भी प्रकार का "Copy Right" नहीं है - सब कुछ "Copy Left" है।
अवश्य छापें - क्योंकि :
भारत के लोगों में देशभक्ति अक्षरशः "मरघटिया वैराग्य" जैसी है। ज्यों ही भारत पर आक्रमण होता है - जैसा की पिछले २००० वर्षों से होता आ रहा है (कोई नई बात नहीं है, आक्रमण न होना नई बात होगी), लोगों  की देशभक्ति उनींदी सी आँखों से जागती हुई प्रतीत होती है - केवल प्रतीत होती है - जागती नहीं है, बस मिचमिचाई हुई आँखों से देख - थोडा बड़बड़ा कर फिर सो जाती है - अगले आक्रमण होने तक।  मैं तो कहता हूँ कि  "मरघटिया वैराग्य" भी बहुत लम्बा समय है - यूँ कहना चाहिए कि सोडा वाटर की बोतल खोलने पर बुलबुलों के जोश जितना या फिर मकई के दाने के गर्म होने पर आवाज कर के फटना और पोपकोर्न बनने की अवधि तक - बस इतना ही - इस से अधिक नहीं। पता नहीं कितने महान लोग भारत को जगाने का असफल प्रयत्न कर कर के मर गए, परन्तु पूरे विश्व में केवल भारत के ही लोग हैं, जो ठान रक्खें हैं कि हम नहीं जागेंगे। जो जाग जाते हैं, उनके साथ ये तकलीफ़ है कि, वे दूसरों को जगाने का मूर्खतापूर्ण कार्य करने लगते हैं - भूल जाते हैं कि, उनके पहले भी उनसे लाख गुना महान आत्माएं सिर पटक के थक गए - परन्तु भारत के लोग नहीं जगे।  हम आप जैसे कुछ लोग भी भारत को जगाने के प्रयास में सहयोग कर रहें है - संभवतः किसी दिन भारत की अंतरात्मा जाग जाये।  चर्मचक्षु  खुलने से जागना नहीं होता है - ज्ञानचक्षु खुलने की नितांत आवश्यकता है - Sooner the Better.
जिस प्रकार हम प्रतिदिन शौचकर्म करते हैं, स्नानादि करते हैं, भोजन करते हैं - यह नहीं कहते कि कल तो किया था फिर आज क्यों - ठीक उसी प्रकार भारत के लोगों की मूर्छित अंतरात्माको जगाने के लिए प्रत्येक जागरूक देशभक्त व्यक्ति को प्रतिदिन प्रयत्न करना है। मैं "चाहिए" शब्द के प्रयोग से बचता हूँ।  हमें प्रयत्न करना "चाहिए" नहीं - हमें प्रयत्न करना है - और करते रहना है।

आनंद जी. शर्मा
मुंबई / दिनांक : १७.०२.२०१०
प्रतिलिपि  प्रेषित की : धर्मेश शर्मा

9 comments:

  1. बहुत खूब कहा , बढिया लगा पढकर ।

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  2. आनंद जी शर्मा की टिप्पणी कल मिल गई थी। प्रकाशित करने की सोची थी, चल जल्द ही करूँगा सोचा था, लेकिन आपने कर दी। मैं आपका शुक्रिया अदा करता हूँ\ और वाक्य बहुत सही है।

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  3. सच कहा .. हमें प्रयत्न करना है ... सबसे पहले तो हम जागें फिर दूसरों को जगाएँ .... कठिन सफ़र है पर चलना है .....

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  4. कितने हैं जो देश के साथ अपने को चिन्हित करते हैं। लोग स्त्री-पुरुष-जाति-धर्म-इलाका-राज्य-अमीर-गरीब के चक्कर से ऊपर उठते ही नहीं। देश और विश्व की बात दूर रही!

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  5. बिलकुल सही बात है खुद कदम उठायेंगे तभी बाकी आपके साथ चलेंगे शुभकामनाये ं सही राह दिखाती पोस्ट। शर्मा जी को बधाई

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  6. बहुत सुंदर जी कल हम ने मेल पर पढ ली थी.
    धन्यवाद

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  7. मरघटिया वैराग्य अपने आप में बहुत कुछ व्यक्त करता शब्द है । देशभक्ति का भी भाव वैसा ही कुछ है । अच्छी व्याख्या ।

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