23 April 2015

कुछ भी नहीं था

कुछ भी तो नहीं था
हाँ कुछ भी नहीं था
तबतक
जबतक तुमने जाते जाते
मेरा हाथ जोर से नहीं पकड़ा था

ऑटो में बैठ चुकी थी तुम
और मैं भी भागने लगा
ऑटो के साथ साथ
अपना हाथ छुड़वाने के लिए
या.....
रुको शायद मैं भी चाहता था
तुम रुको
कुछ देर और
यहीं सड़क पर
मेरे साथ

ताकि देख सकूँ मैं तुम्हें
जी भरकर
लेकिन तुम तो देख ही नहीं सकती थी
धुंध थी तुम्हारी आँखों में आंसुओं की

और मेरी आँखों में भी
शायद नहीं
मैं कैसे रो सकता हूँ
यूँ बीच सड़क पर
पुरुष हूँ ना

और तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी तो नहीं था
हाँ कुछ भी नहीं था

वहां रह गया था मैं
या शायद नहीं
हां मैं भी नहीं
क्योंकि
कुछ भी तो नहीं था
हां कुछ भी नहीं था

6 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.04.2015) को "आँखों की भाषा" (चर्चा अंक-1955)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
  2. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जरुर आऊंगा प्रणाम करने

      Delete

मुझे खुशी होगी कि आप भी उपरोक्त विषय पर अपने विचार रखें या मुझे मेरी कमियां, खामियां, गलतियां बतायें। अपने ब्लॉग या पोस्ट के प्रचार के लिये और टिप्पणी के बदले टिप्पणी की भावना रखकर, टिप्पणी करने के बजाय टिप्पणी ना करें तो आभार होगा।