13 January 2010

मैं ही सही, क्योंकि तू गलत है

कुछ लोग खुद को सही, श्रेष्ठ, बेहतर साबित करने के लिये  बजाय अपनी उपलब्धि  बताने के ; दूसरे को गलत, निकृष्ट, कमतर साबित करने में अपनी सारी शक्ति और ऊर्जा लगा देते हैं।
प्रत्येक को ऐसी प्रतीति हो सकती है कि जिस मार्ग पर मैं जा रहा हूं, वह सही है। इस प्रतीति में कोई भूल भी नहीं है। लेकिन जैसे ही यह भ्रांति भी हो जाती है कि जिस मार्ग से मैं जा रहा हूं, वही सही है, वैसे ही झगडा शुरू हो जाता है। शायद इतने से भी उपद्रव न हो, अगर मैं यह जानूं कि यह मार्ग मेरे लिये सही है। लेकिन अहंकार यहीं तक रुकता नहीं। अहंकार एक निष्कर्ष अनजाने ले लेता है कि जो मेरे लिए सही है, वही सबके लिए भी सही है।
 
धर्मों के नाम से जो उपद्रव है, वह धर्मों का नहीं, अहंकारों का उपद्रव है। मेरा अहंकार यह मानने को राजी नहीं होता कि कोई और ढंग भी सही हो सकता है। यही मानने को तैयार नहीं होता कि मेरे अतिरिक्त कोई और भी सही हो सकता है। तो मेरा ही रास्ता होगा सही, मेरी उपासना पद्धति होगी सही, मेरा शास्त्र होगा सही। लेकिन मेरा यह सही होना तभी मुझे रस देगा, जब मैं सब दूसरों को गलत साबित कर डालूं।

और ध्यान रहे, जो दूसरों को गलत करने में लग जाता है, उसकी शक्ति और ऊर्जा उस मार्ग पर तो चल नही पाती, जिसे उसने सही कहा है; उसकी शक्ति और ऊर्जा उनको गलत करने में लग जाती है, जिन पर उसे चलना ही नहीं है।

कुछ पंक्तियां गीता-दर्शन (भाग चार) अध्याय आठ से साभार ली गई है। अगर ओशो इन्ट्रनेशनल फाऊण्डेशन या किसी को आपत्ति है तो हटा दी जायेंगी।

12 comments:

  1. "ध्यान रहे, जो दूसरों को गलत करने में लग जाता है, उसकी शक्ति और ऊर्जा उस मार्ग पर तो चल नही पाती, जिसे उसने सही कहा है; उसकी शक्ति और ऊर्जा उनको गलत करने में लग जाती है, जिन पर उसे चलना ही नहीं है।"

    एकदम सही बात कही है आपने!

    एक सार्थक सन्देश देता हुआ पोस्ट!

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  2. मुझे लगता है कि ये के स्वाभाविक इंसानी फ़ितरत है और हम सब जाने अनजाने ये कभी न कभी तो कर ही बैठते हैं , मगर इसे आदत बना लेना निश्चित ही अहितकर है और शायद मूढता भी । सुंदर संदेश दिया आपने
    अजय कुमार झा

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  3. अगर इतनी सी बात मूर्ख इंसान की समझ में आ जाए तो फिर झगडा ही किस बात का रहेगा ? उम्दा लेख !

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  4. कोई भी मार्ग हर देश, काल और परिस्थिति में सही नहीं हो सकता .. इसमें कुछ न कुछ खामियां आने से यह धनात्‍मकता और ऋणात्‍मकता का संगम हो जाता है .. सब मार्गों के गुणों और दोषों के विश्‍लेषण से हमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए .. पर इसमें भयंकर टकराव के बाद हमें एक सर्वमान्‍य मार्ग का निर्माण अवश्‍य करना चाहिए !!

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  5. बहुत सुंदर विचार है, ओर यह बात हम सब जाने अन्जाने मै कर ही बेठते है, लेकिन जहां भी हमे लगे की हम भुल कर रहे है... हमे समभंल जाना चाहिये,वरना ऎसे लोग सारी दुनिया से अलग हो जाते है, ओर बस अपना ही नुकसान करते है.... मिलते है ऎसे बहुत से लोग... तभी तो हम एक दुसरे से सलाह करते है कि कही हम अंहाकरी ना बन जाये,एक दुसरे के विचारो का आदान प्रदान करते है, आप के लेख से सहमत है जी

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  6. इंसान का इंसान से हो भाईचारा,
    यही पैगाम हमारा, यही पैगाम हमारा...

    जय हिंद...

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  7. बिल्कुल सत्य और सुंदर बात कही आपने.

    रामराम.

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  8. baat to sahi hai....log swayam ko bhala batane ke chhakkar men...khud ko unchha uthhane kii bajay doosron ke pair khinchne men lag jate hain.........

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  9. आपने अपनी पोस्ट के माध्यम से कितना सही और सुन्दर सन्देश दिया है बस अगर इन्सान इतनी छोटी सी बात समझ ले तो दुनिया के सभी झगडे स्माप्त हो जायें शुभकामनायें

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  10. अति उत्तम विचारो को कितनी सरलता से व्यक्त किया है आपने. अभिनन्दन.
    व्यक्ति का अहम् ego) ही सब उपद्रवो का मूल है उसे उखाड़ फेकना आसान होता तो आज समाज मे हिंसा, होड़ और हैवानियत अपने चरमसीमा पर नहीं पहुँच पाते.

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  11. पता नहीं, हिन्दू धर्म - या कम से कम मेरा हिन्दू धर्म तो बहुत उदात्त है। वह किसी को नीचा दिखाने में नहीं लगता।
    हिन्दू धर्म के नाम पर संकुचित सोच रखने वालों की मैं नहीं कह रहा।

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मुझे खुशी होगी कि आप भी उपरोक्त विषय पर अपने विचार रखें या मुझे मेरी कमियां, खामियां, गलतियां बतायें। अपने ब्लॉग या पोस्ट के प्रचार के लिये और टिप्पणी के बदले टिप्पणी की भावना रखकर, टिप्पणी करने के बजाय टिप्पणी ना करें तो आभार होगा।